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कागज़ के टुकड़े

मुड़े तुड़े से काग़ज़ के टुकड़े, सँभालूँ कितने इस दिल के टुकड़े। हर पुर्ज़े पर लफ़्ज़ आधे अधूरे हैं, टूटे दिल के कई अरमान अधूरे हैं। ज़रा सा वक़्त दे ये टुकड़े सजा लूँ, रूठे दिलों के सोज़ मना लूँ। उजाले फिर करूँ फिर सँवारु कोई आईना, मेरा अक्स कहीं पूछ न बैठे मेरे कल के आशना। गर्द में ग़ुम उन पन्नों का मैं हिसाब क्या दूँ, दिल में दफ़्न इस दर्द को अल्फ़ाज़ क्या दूँ। ज़िंदगी की हसरतों के अब परवान नहीं हैं। अरमानों की परवरिश कोई आसान नहीं है।। - राकेश (07.07.2021)

यूँ ही

खुद मुख़्तार है ये इश्क बड़ा, किया तो जाता नहीं, बस हुआ जाता है। हकीमों से वास्ता बा क़दर रखना, बरकतें लफ्जों की काम आएं न आएं। वो क्या है कश्ती, न मौजों की जिसने देखी रवानी, जुल्फों में उलझी ही नहीं कभी, लिल्लाह ये कैसी तेरी जवानी । (मुझे आँखें पढ़नी थी उनकी , और वो थे कि नज़रे झुकाए खड़े रहे ) तहरीर ओ तकरीर ही गैर थी उनकी, आंखें तो हमें भी पढ़नी थीं वरना .. तर्जुमा ही कुछ ऐसा बयां हुआ, के आरजुएं सब फना हो गईं  हम समझ ना पाए वक्त पर के तू ही मेरी मंज़िल थी, मेरा वक्त थम गया मेरी मंजिल चली गई, मेरी मंजिल जब रुकी, मेरा वक्त चला गया। ये बेबाक़ी है तेरी के बस तसव्वुर मेरा तगाफुल सा लगता है हर तकल्लुफ तेरा उनको हो न हो मिरे वजूद की ख़बर खुसूसियत अपनी मयकदों  में ख़ूब है कब किसी ने कहा है कि कुछ खास कीजे, जो कहा जाना था सब कह चुके,  कहने को अब क्या बाकी है  सुनेगा कौन? क्यों इंतजार कीजे,  जुबां बड़ी नेमत है हुज़ूर , जो कुछ न हो सके तो बकवास कीजे  छोटी सी किश्ती, और समंदर बड़ा गहरा है। लाज़म है दोस्ती दरमियां रहे,  वरना इंसा कब किसी के लिए ठहरा है। अज़ीज़ कब...

मनमीत

मित्र तो थे, मनमीत नहीं था स्वजनों का स्नेह बहुत था, पर मान युग्म सा कहाँ मिला था? तुमसे नई पहचान मिली है, संबंधों को आँच मिली है.. त्योहारों के रंग तुम्हीं से हैं, जीवन की हर रीत तुम्हीं से है... कुछ शब्द जुड़े थे, काव्य नहीं था, छंद कहूँ पर ताल नहीं था.. मधुर प्रेम के शब्द समूह का, तुम आईं तो गीत बना है.. सुर और लय का साथ तुम्हीं से है, जीवन का संगीत तुम्हीं से है... - राकेश (28 Nov 2022)

पिंजरों के आदमी

जज़्ब क्या, अरमान क्या,  इन उम्रदराज़ परिंदों की उड़ान क्या, ऊँघना है सूखे किसी ठूँठ पे बैठे हुए,  इन्हें दरख्तों की कोठरें क्या, घोंसले क्या? दर्द ए हिज्र क्या, वफ़ा की ज़ुस्तज़ू क्या, गिरेबां चाक न महके जिसपे, वो आशिक क्या, जिनको हासिल हों मोहब्बतें बेसाख्ता, ऐसे कमबख्तों को महफ़िल क्या, शराब क्या? दास्ताने रोज़मर्रा सुनना क्या, सुनाना क्या , बेगा़ने फ़सानों से जी को बहलाना क्या, दो बूँद भी ढल न सकीं जो आँखों से, ऐसी बेज़र ओ बेजान यादों का आना क्या? रवाज़ों की फिक्र क्या, निज़ाम क्या, पशेमाँ पर्दादारों का एहतराम क्या, ताउम्र गुज़र गए जो रहके पाबन्द पानी, ऐसे मुर्दों का जीना क्या, मर जाना क्या? - राकेश जज़्ब - बर्दाश्त हिज़्र - जुदाई ज़ुस्तज़ू - तलाश गिरेबाँ चाक - खस्ताहाल, फटेहाल बेसाख्ता - स्वाभाविक रूप से बेज़र - कंगाल रिवाज़ - परंपरा निज़ाम - प्रबंध, व्यवस्था पशेमाँ - लज्जित, शर्मिंदा, पश्चाताप युक्त एहतराम - इज़्ज़त, आदर

सांझ

पीड़ित मन की व्यथा अहो, जीवन दुःख की आँच अहो। पुष्प पँखुरी झरे चले, साँझ पखेरू उड़े चले.. मरुभूमि सा सूखा जीवन, कितनी दूर यह नदी चले.. आत्मदीप में तेज नहीं, अँधियारा भी दूर नहीं.. पर साँझ लालिमा देखूँ तो, नवनीड़ डाल पर देखूँ तो.. वह मृग छल सी धुँधली काया, अब मन-दर्पण में देखूँ तो.. यह शेष लालसा खोऊँ क्यों, अनुराग ह्रदय का छोड़ूँ क्यों.. उजियारा क्षितिज पर ढला नहीं, मैं चुनर श्यामला ओढूँ क्यों..? - राकेश (05.07.2020)