पिंजरों के आदमी
जज़्ब क्या, अरमान क्या,
इन उम्रदराज़ परिंदों की उड़ान क्या,
ऊँघना है सूखे किसी ठूँठ पे बैठे हुए,
इन्हें दरख्तों की कोठरें क्या, घोंसले क्या?
दर्द ए हिज्र क्या, वफ़ा की ज़ुस्तज़ू क्या,
गिरेबां चाक न महके जिसपे, वो आशिक क्या,
जिनको हासिल हों मोहब्बतें बेसाख्ता,
ऐसे कमबख्तों को महफ़िल क्या, शराब क्या?
दास्ताने रोज़मर्रा सुनना क्या, सुनाना क्या ,
बेगा़ने फ़सानों से जी को बहलाना क्या,
दो बूँद भी ढल न सकीं जो आँखों से,
ऐसी बेज़र ओ बेजान यादों का आना क्या?
रवाज़ों की फिक्र क्या, निज़ाम क्या,
पशेमाँ पर्दादारों का एहतराम क्या,
ताउम्र गुज़र गए जो रहके पाबन्द पानी,
ऐसे मुर्दों का जीना क्या, मर जाना क्या?
- राकेश
जज़्ब - बर्दाश्त
हिज़्र - जुदाई
ज़ुस्तज़ू - तलाश
गिरेबाँ चाक - खस्ताहाल, फटेहाल
बेसाख्ता - स्वाभाविक रूप से
बेज़र - कंगाल
रिवाज़ - परंपरा
निज़ाम - प्रबंध, व्यवस्था
पशेमाँ - लज्जित, शर्मिंदा, पश्चाताप युक्त
एहतराम - इज़्ज़त, आदर
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