सांझ
पीड़ित मन की व्यथा अहो,
जीवन दुःख की आँच अहो।
पुष्प पँखुरी झरे चले,
साँझ पखेरू उड़े चले..
मरुभूमि सा सूखा जीवन,
कितनी दूर यह नदी चले..
आत्मदीप में तेज नहीं,
अँधियारा भी दूर नहीं..
पर साँझ लालिमा देखूँ तो,
नवनीड़ डाल पर देखूँ तो..
वह मृग छल सी धुँधली काया,
अब मन-दर्पण में देखूँ तो..
यह शेष लालसा खोऊँ क्यों,
अनुराग ह्रदय का छोड़ूँ क्यों..
उजियारा क्षितिज पर ढला नहीं,
मैं चुनर श्यामला ओढूँ क्यों..?
- राकेश (05.07.2020)
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