यूँ ही
खुद मुख़्तार है ये इश्क बड़ा,
किया तो जाता नहीं, बस हुआ जाता है।
हकीमों से वास्ता बा क़दर रखना,
बरकतें लफ्जों की काम आएं न आएं।
वो क्या है कश्ती, न मौजों की जिसने देखी रवानी,
जुल्फों में उलझी ही नहीं कभी, लिल्लाह ये कैसी तेरी जवानी ।
(मुझे आँखें पढ़नी थी उनकी , और वो थे कि नज़रे झुकाए खड़े रहे )
तहरीर ओ तकरीर ही गैर थी उनकी, आंखें तो हमें भी पढ़नी थीं वरना ..
तर्जुमा ही कुछ ऐसा बयां हुआ, के आरजुएं सब फना हो गईं
हम समझ ना पाए वक्त पर के तू ही मेरी मंज़िल थी,
मेरा वक्त थम गया मेरी मंजिल चली गई,
मेरी मंजिल जब रुकी, मेरा वक्त चला गया।
ये बेबाक़ी है तेरी के बस तसव्वुर मेरा
तगाफुल सा लगता है हर तकल्लुफ तेरा
उनको हो न हो मिरे वजूद की ख़बर
खुसूसियत अपनी मयकदों में ख़ूब है
कब किसी ने कहा है कि कुछ खास कीजे,
जो कहा जाना था सब कह चुके,
कहने को अब क्या बाकी है
सुनेगा कौन? क्यों इंतजार कीजे,
जुबां बड़ी नेमत है हुज़ूर ,
जो कुछ न हो सके तो बकवास कीजे
छोटी सी किश्ती, और समंदर बड़ा गहरा है।
लाज़म है दोस्ती दरमियां रहे,
वरना इंसा कब किसी के लिए ठहरा है।
अज़ीज़ कब रही हमें परदेदारों की सोहबत,
हमें तो पहरेदारों ने रोका था..
- राकेश
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