कागज़ के टुकड़े
मुड़े तुड़े से काग़ज़ के टुकड़े,
सँभालूँ कितने इस दिल के टुकड़े।
हर पुर्ज़े पर लफ़्ज़ आधे अधूरे हैं,
टूटे दिल के कई अरमान अधूरे हैं।
ज़रा सा वक़्त दे ये टुकड़े सजा लूँ,
रूठे दिलों के सोज़ मना लूँ।
उजाले फिर करूँ फिर सँवारु कोई आईना,
मेरा अक्स कहीं पूछ न बैठे मेरे कल के आशना।
गर्द में ग़ुम उन पन्नों का मैं हिसाब क्या दूँ,
दिल में दफ़्न इस दर्द को अल्फ़ाज़ क्या दूँ।
ज़िंदगी की हसरतों के अब परवान नहीं हैं।
अरमानों की परवरिश कोई आसान नहीं है।।
-राकेश (07.07.2021)
Comments
Post a Comment